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क्यों भगवान विष्णु ने लिया वारहा अवतार ?

  • hinduchannel7
  • Apr 17, 2020
  • 3 min read



पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के द्वार पर दो

रक्षक ते ! जया और विजया दोनों रक्षक अगर भगवान विष्णु

आराम कर रहे है तो किसी को अंदर नहीं बेज़ते ! अने मालूम

था कि भगवान विष्णु का समय महत्वपूर्ण है !


एक दिन ब्रह्माजी के चार पुत्र वाहा आह जाते है ! वे भगवान

विष्णु से मिलना चाहते है ! लेकिन भगवान आराम कर रहे है

इसलिए रक्षक उने अंदर जाने से रोकते है ! इस व्यवहार से

वे क्रोधित हो उटते है ! उने वे श्राप दे देते है कि वे मनुष्य

जन्म लेकर पृथ्वी पर जीवन वैतित करेंगे ! तबी भगवान

विष्णु जाग जाते है बाहर आवज सुनकर वे बाहर आ जाते

है ! वे ब्रह्माजी के पुत्रो से माफी मांगते है और रक्षक को क्षमा

करने के लिए कहते है !


लेकिन ब्रह्माजी के पुत्र उनसे कहते है कि श्राप वापस नहीं

लिया जा सकता ! इतना कहकर वे चले जाते है ! भगवान

विष्णु कहते है इसका अभी एक ही उपाय है ! तुम्हे दरतिपर

जाकर मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ेगा और अगर तुम्हारी

मृत्यु मेरे हाथो हुई ताबी तुम्हे फिरसे वैकुंठ प्राप्त होगा !


जया और विजया पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म लेते है !

एक हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष ! हिरण्याक्ष ब्रह्माजी

की गोर तपस्या करके उने प्रसन्न कर लेते है ! ब्रह्माजी

उसे वरदान मांगने के लिए कहते है ! वो वरदान मांगता

है कि उसे शक्तिशाली होने का वरदान चाइए और उसकी

मुर्त्यू किसी देवता, राक्षस , मनुष्य या कोई जानवर के हाथो

ना हो ! ब्रह्माजी उसे वरदान दे देते है ! वरदान पाकर वो

बहुत शक्तिशाली बन जाता है !


पहले तो वो पृथ्वी पर आक्रमण करके उसे जीत लेता है !

पाताल लोक भी जीत लेता है ! इन्द्र लोक पर आक्रमण

करके उसे भी जीत लेता है ! देवता बेहबित होकर पृथ्वी

पर एक पर्वत के गुफा में जा चूपते है ! देवताओं को

तकलीफ़ देने के लिए हिरण्याक्ष पृथ्वी को लेकर समदर

मैं लेकर जाता है ! रसातल में वो पृथ्वी को रख देता है !


राजा मनु पृथ्वी के राजा ते ! वे अपनी समस्या लेकर ब्रह्माजी

के पास चले जाते है ! ब्रह्माजी कहते है की वे वरदान के कारण कुछ नहीं कर सकते ! अभी सिर्फ भगवान विष्णु ही कोई मार्ग दिखा सकते है ! वे भगवान विष्णु की आराधना करने लगते है ! तभी उनके नाक से एक बारीक वाराह गिरता है ! और देखते ही देखते वो पर्वत के इतना बड़ा हो जाता है ! वो ब्रह्माजी से कहता है कि वो सबकी रक्षा करेगा हिरण्याक्ष से !


हिरण्याक्ष ने जाकर वरुण देव से कहा कि वे उनसे युद्ध करे !

वरुण देव को गुस्सा तो आया लेकिन उनोने समय देखर

कहा ! की वे अबी इतने बलशाली पुरुष से नहीं लड़ सकते अगर तुमें इतना ही घमंड है तो तुम क्यों ना भगवान विष्णु से लड़ते ! वे तुम्हे हरा सकते है ! वरुण देव की बात सुनकर उस दैत्य ने देवर्षि नारद के पास जाकर नारायण का पता पूछा।


देवर्षि नारद ने उसे बताया कि नारायण इस समय वाराह का रूप धारण कर पृथ्वी को रसातल से निकालने के लिये गये हैं। इस पर हिरण्याक्ष रसातल में पहुँच गया। वहाँ उसने भगवान वाराह को अपने दाढ़ पर रख कर पृथ्वी को लाते हुये देखा।

उस महाबली दैत्य ने वाराह भगवान को बहुत अपशब्द

कहे !


हिरण्याक्ष के इन वचनों को सुन कर वाराह भगवान को बहुत

क्रोध आया किन्तु पृथ्वी को वहाँ छोड़ कर युद्ध करना उन्होंने

उचित नहीं समझा और उनके कटु वचनों को सहन करते हुये

वे गजराज के समान शीघ्र ही जल के बाहर आ गये। उनका

पीछा करते हुये हिरण्याक्ष भी बाहर आया और कहने लगा,

"रे कायर! तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? आकर मुझसे

युद्ध कर।" पृथ्वी को उचित स्थान पर रखकर भगवान वाराह

हिरण्याक्ष को मारने गए ! भगवान वाराह और हिरण्याक्ष

मे भयंकर युद्ध हुआ और अन्त में हिरण्याक्ष का भगवान

वाराह के हाथों वध हो गया।

 
 
 

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